"तिब्बत की आजादी भारत की सुरक्षा".. यह कहते हुए उगिन हँस पड़ता है. जैसे अचानक उसे कुछ याद आया पहले इस बोध पर विस्मय और फिर उसी पल खगोलीय वास्तविकताओं की पहचान कर एक उदासी.
Tuesday, March 10, 2009
तिब्बत
"तिब्बत की आजादी भारत की सुरक्षा".. यह कहते हुए उगिन हँस पड़ता है. जैसे अचानक उसे कुछ याद आया पहले इस बोध पर विस्मय और फिर उसी पल खगोलीय वास्तविकताओं की पहचान कर एक उदासी.
Wednesday, March 04, 2009
The Clone
sleeping till midnight ? I asked the man.
He said I am awake you are asleep,
but we are both dreaming,I said.
He said I am awake you are asleep,
but we are both dreaming,I said.
Sunday, February 08, 2009
हिममानव
ताकती उनकी खुली आंखें सफेद आकाश को
चलते चलते वे जैसे रूक गए पार्क की ढलान पर
संभवी मुद्रा में
पेडो़ं के बीच
ठिठका
उन्हें देख
कहीं वे
लोग
जनमे हो जैसे इस बार जल चेतना में
मुझ से डर कर तो नहीं बन गए बर्फानी बुत
वे सोचते होंगे
कैमरे के लेंस से
अपलक उन्हें देखता है कोई हिममानव?
भय अज्ञान है
सच्चाई भय
और अज्ञान सच्चाई है
© 8/2/2009
Thursday, January 15, 2009
सफेद सूरज
Thursday, January 01, 2009
नववर्ष 2009 की हार्दिक शुभकामनाएँ

31 दिसंबर की सुबह जमे हुए पाले में प्रकट हुई, बाहर कुहासे में ठिठुरता हुआ सन्नाटा. बगीचे में एक मैग्पाइ (मुटरी) उड़कर शंकु वृक्ष के शिखर पर बैठ गई. हमेशा सतर्क रहने वाली चिड़िया, चुपके से उसकी दो तीन तस्वीरें ले ली. इसे चालाक और चोर चिड़िया लोग कहते हैं क्योंकि इसके घोंसले में चमकीली चीजें पाई जाती हैं. पर चीन में मैग्पाइ को शुभ माना जाता है.
Monday, December 29, 2008
मंजीत बावा

सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया को पढ़ता हूँ खबरों की सूची में एक खबर पर नजर पड़ती है 'मंजीत बावा नहीं रहे', वे पिछले तीन साल से कोमा में थे. मुझे 1986-90 के दौरान उनसे हुई मुलाकातें ध्यान आने लगती हैं रवीन्द्रभवन, गढ़ी स्टूडियो, धूमीमल गैलरी,त्रिवेणी या कहीं रास्ते में. स्मृतियों के डिब्बे में बोलती पड़ती हैं आवाजें, चल पड़ती हैं मानसिक चित्रपट की खिड़कियों में कुछ रीलें... और बाहर एक रंगहीन ठंडा आकाश, उदास धूप की कुछ कतरनें
Sunday, December 07, 2008
शोकगीत
दम साधे सावधान
कि सांस बेचैन है फेफड़ों में,
आतंक के गलियारों में विलुप्त हैं शोकगीत इस बार,
चुप क्यों हैं शोकगीतों के कवि
उनका दुख आक्रोश बेचारगी
अपनी अनुपस्थिति का कोई कारण बूझते
कहाँ हैं वे कवि?
अकेले नहीं पूरी हो सकती यह कविता
चीखों के बियाबान में,
सबसे पहले भूल जाते हैं
आइने के सामने हम अपने को ही
©मोहन राणा
Monday, September 15, 2008
Sunday, September 07, 2008
पानी का रंग
यहाँ तो बारिश होती रही लगातार कई दिनों से
जैसे वह धो रही हो हमारे दागों को जो छूटते ही नहीं
बस बदरंग होते जा रहे हैं कमीज पर
जिसे पहनते हुए कई मौसम गुजर चुके
जिनकी स्मृतियाँ भी मिट चुकी हैं दीवारों से
कि ना यह गरमी का मौसम
ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन
कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ,
शायद कोई रंग ही ना बचे किसी सदी में इतनी बारिश के बाद
यह कमीज तब पानी के रंग की होगी !
© मोहन राणा 8.9.2008
Monday, August 18, 2008
त्यागपत्र
Thursday, July 17, 2008
वो उड़ चला बादल बन
यह किस तरह की बारिश
जो रोज होती है अलग अलग समय
कौन पौंछता होगा उसके चेहरे को,
टकराते टूटते संभालते अपने आप
को
मिटाते किसी आत्मलाप को किनारों से
पुरातीत सीत्कार के साथ
पर फिर एक पल झिझक
जैसे मुड़कर कोई देखता कुछ याद कर
जो समुंदर कहीं नहीं पहुँच पाया वो उड़ चला बादल बन,
अक्सर ऐसा ही होता है
पर कुछ होते हैं जो
शायद ... बन जाते हैं आकाश
17.7.08
©मोहन राणा
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