बढ़ती हुई ठंड और पेड़ों के रंग सुर्ख, पतझर धीरे धीरे अपने किनारे की ओर बढ़ रहा है.
Wednesday, November 07, 2007
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The Translator : Nothing is Translated in Love and War
8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...
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चुनी हुई कविताओं का चयन यह संग्रह - मुखौटे में दो चेहरे मोहन राणा © (2022) प्रकाशक - नयन पब्लिकेशन
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पेंच जहाँ भी पड़ती नजर हर दिशा हर जगह हैं , खिड़की दरवाजों दीवारों मेज और जिस कुर्सी पे बैठा हूँ उस पर भी पूरे घर में पेंच लगे हैं व...
1 comment:
पर पता नहीं क्यों
ऐसा लगता है जैसे ,
पतझर अपनें किनारे की ओर नहीं
हम सबके बीच चला आ रहा है।
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