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Friday, June 07, 2024

लंदन में एक दिन

 

पिछले बरस फरवरी में 12वें 'विश्व हिन्दी सम्मेलन' में अपरिहार्य कारणों से मैं फ़िजी नहीं जा सका, आवागमन का प्रबंध भारत सरकार का था।
तथापि लंदन बीता परसों एक दिन।
फ़िजी में सम्पन्न हुए 12वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का 'विश्व हिन्दी सम्मान' उस दिन भारतीय उच्चायोग लंदन  में सादर प्राप्त हुआ।
उच्चायोग में मंत्री समन्वय दीपक चौधरी जी और संस्कृति अताशे नंदिता जी को बहुत धन्यवाद।



 

लंदन में ही देर दोपहर लंबे अरसे से लंबित ललित मोहन जोशी जी और कृष्ण बजगाईं जी  से ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट में मुलाकात हुई, समय कम था फिर भी एक अच्छी यादगार मुलाकात ।
फिर ट्रेन वापस । कि एक दिन ऐसा हुआ।
 

Thursday, January 04, 2024

लिखने एक चिठ्ठी

 मैं लिखने बैठा गश्ती चिठ्ठियाँ

पेड़ के नीचे अनवरत मर्मर में,

पतझर में वे गिरती रहीं

तुम्हें देख मैं ठहर गया 

 (2024)



 

 

 

 

 

 

 

 

 

Tuesday, September 19, 2023

एकांत में रोशनदान : मोहन राणा Ekaant Men Roshandaan : Mohan Rana

                                                                 नया कविता संग्रह

                                           एकांत में रोशनदान (2023)

 


                                नयन पब्लिकेशन  -- https://amzn.eu/d/9ddsXkJ
  • प्रकाशक ‏ : ‎ Nayan Publication (7 सितंबर 2023)
  • भाषा ‏ : ‎ हिंदी
  • पेपरबैक ‏ : ‎ 130 पेज
  • ISBN-10 ‏ : ‎ 8195429920
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 978-8195429929

 

"मोहन राणा अनूठे कवि हैं। उनका रहस्य को शब्दों की टपरी के नीचे अर्थ की छाँव में क्षण भर के लिए आमंत्रित कर लेने का हुनर लाजवाब है। उनके अपने शब्दों में ‘कवि जब लिखता ही नहीं बल्कि कविता में जीता है तो रचना कालातीत हो जाती है।’ वे कविता को जीते हुए उसके कालातीत होने की घटना के साक्षी बनते हैं। उनकी कविता साधु की तरह रमण करती है, यायावर कि तरह विचरण करती है, परिदों की तरह उड़ान भरती है और अनचीन्हे, अनुबूझे गन्तव्यों से गुज़रकर सूक्ष्म रहस्य की छाँव में एक परिपूर्ण पथिक की भाँति विश्राम करती है। मोहन राणा की कविताएँ कुलाँचे भरती हैं- शब्द के पार अर्थ की ओर, अर्थ के पार भाव की ओर, भाव के पार बोध की ओर, बोध के पार निविड़ मौन की ओर ; और मौन के पार शून्य की ओर। "
- चैतन्य प्रकाश योगी


समीक्षा / Review
https://www.raagdelhi.com/mohan-rana-ekant-me-roshandaan-review-by-naresh-shandilya/

Tuesday, April 25, 2023

य़ू.के. हिन्दी सम्मान 2019

य़ू.के. हिन्दी सम्मान 2019

 वर्ष 2019 के लिए श्री हरिवंश राय बच्चन (लेखन सम्मान)

सम्मान कार्यक्रम 20 मार्च 2023 को  लंदन में भारतीय उच्चायोग में ।
वर्ष 2019 के लिए श्री हरिवंश राय बच्चन (लेखन सम्मान) लिए य़ू.के. हिन्दी सम्मान  के लिए उच्चायोग की चयन समिति ने मुझे सम्मान के लिए चुना।

 




Monday, February 13, 2023

 

Ret Ka Pul | Revised Second Edition | रेत का पुल  संशोधित दूसरा संस्करण © 2022 Paperback

  • Publisher ‏ : ‎ Nayan Publication Depot 
  • Language ‏ : ‎ Hindi
  • Paperback ‏ : ‎ 103 pages
  • ISBN-10 ‏ : ‎ 8195429904
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 978-8195429905

Tuesday, May 24, 2022

मुखौटे में दो चेहरे (कविता चयन) :: मोहन राणा

 चुनी हुई कविताओं का चयन यह संग्रह -

मुखौटे में दो चेहरे 
मोहन राणा
© (2022)

प्रकाशक - नयन पब्लिकेशन

 





Wednesday, June 06, 2018

वसंत

Robin / Photo-Mohan Rana
रॉबिन । फ़ोटो - मोहन राणा















बरस कितने बीते यहाँ इधर
वहाँ वे कहते फिर सुनाते कहानी
याद जिसे कभी करते जब तब
हम आपको याद करते हैं मैं सुनकर जैसे भूलता
धमनियों में बहते वर्तमान के तनाव को,
वे कठिन दिन अब दवा की तरह काम करते हैं
घर की रंगाई पुताई हो रही है मौसम बदले
और यह बाजार में ब्रिकी के लिये टंगा होगा
प्रोपट्री डीलर की खिड़की पर
मुझे भरोसा था कविता पर भाषा पर नहीं रहा
जैसे अपनी हथेली का भाग्य रेखा पर नहीं रहा,
झुरमुर-झुरमुर बारिश में रॉबिन बोलती रोवन के पेड़ पर
वसंत अपनी गाँठें ही खोल रहा है अभी
विगत की अंतःकरण यात्राओं से
जाने क्या खोल रख देगा अपनी गठरी से कोंपलों के साथ




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प्राचीन कहते हैं कवि पार चला जाता है...
कवि सीमापार करता है

अब यह कौन सी सीमा
शब्द की सीमा
प्रेम की सीमा
भय की सीमा
मौन की सीमा
पार कर
वह एक लावारिस जगह का निवासी
दो खिड़कियाँ उसके हाथ में  इस ओर उस ओर
दो दृश्य एक साथ कविता उपस्थित -
मैं और तुम जैसे हमेशा हर पंक्ति में उपनिषद 

गोचर अगोर उड़ान में धरती आकाश में नहीं रहता अंतर
शायद आयाम के पार जाने की अभीप्सा
और साथ चलती रहती है आजीवन छंटाई बुनाई
और कल के बाकी वायदों के कर्ज का निपटान,
कल कहा था आज फिर 
जो बचा रह जाय उसे अपनी किताब में लिख देना,
यही मान तो मैं वापस सीमापार करता हूँ
मौन की सीमा
जब दो पैर अपनी ही परछाईं  पार करते हैं लौटते वहीं 


- मोहन राणा
©  Mohan Rana

Tuesday, April 10, 2018

Missing from language






Torus
Just imagine universe itself; the vibration, the energy and the frequency!
Counting there is a deeper philosophical truth in this if what is missing from language!













 





मैं चुनता कुछ बसेरा पर ठहर  जंगलात के पतरौल बन,
घर ही बन जाय  वहीं होंगे पुरखे भी ऊँचे डांडों को ताकते


  ©2018 Mohan Rana

Thursday, March 22, 2018

कविताएँ मैंने लिखीं

हम कितने उथले थे अपनी भावनाओं में
रुक कर नहीं पूछते  यह चोट कैसी है तुम्हारे माथे
जिसका घाव आइने में देखता हूँ !
पर  कविताएँ मैंने लिखीं 
© 8/12/2017



















© 8/12/2017 Mohan Rana

Wednesday, January 03, 2018

दूर खिड़की पास दिल्ली



दूर खिड़की पास दिल्ली

भाग रहा हूँ पर दूरियाँ बढ़ती चली जाती हैं
6900 किलोमीटर दूर ही रह गई
भाग रहा हूँ नज़दीक जाने कहीं
दूर खिड़की पास दिल्ली
पर गंतव्य छूट रहा पीछे कहीं
जो कल सोचा वह आज नहीं
लपेटता जैसे किसी और तह में ख़ुद को
तस्मों को ढीला करता नंगे पाँव दौड़ते

 [29.11.2008] 

- मोहन राणा



(रेत का पुल /कविता संग्रह : 2012)

Saturday, December 02, 2017

भरोसा































भरोसा


दिनभर बोलता जिद्दी रुरुआ नींद में भी जगा
सांस की जगह ले चुका मन की बातों में
अब मैं बिना फूँक के भी बजता बाजा हूँ
अपने ही शोर में बहरे कानों के भीतर

मैं बताऊँगा उन्हें सपने देखता
मैं उन जैसा नहीं अकेला
पर अलग
रचता उन जैसा ही सहेजता
छुअन भर एक भरोसा

यही पल हमेशा आख़िरी
और इससे पहले ना जिया कभी
जितना मैं पास उतना ही दूर
कोलाहल में उस अकारथ देह रेखा से,
गुमसी मेट्रो में एक हाथ से थामे अपनी स्पर्श निजता
अपने जीवन से असहमत कितनी बार और हर बार भूल जाता
भाग कर याद दिलाते जियी हुई सीख अपने अकेलेपन को
ऐसे ही पल जब मैं पहचानता हूँ
फिर लौटते अपनी इच्छाओं के व्योम
हो जाए पार चौखट पल्ली पार
मन जाने कहाँ लग जाता है यही सोचकर

अतीत पर चलना होता है आसान
मनचाही खुशी और दुख को उसमें भरना,
धीमी आवाज़ में अधूरी कहानियों का निरंतर पाठ है उसका तहखाना
जहाँ रात का पेड़ हरा भरा जिस पर सोई हैं स्मृतियाँ,
जब कभी अँधेरे में भी पहचान लेंगे एक दूसरे को वहाँ
बढ़ाते हाथ गिरते कंधों को थामने,
हर रोज़ मान कर चल पड़ते
आँख खुलने को अपने जीवित होने का प्रमाण,
अपनी सुनाने की बारी आने का
है ना हमें भरोसा 


2009



शेष अनेक ( 2016)  © मोहन राणा


© Mohan Rana
Published by Copper Coin, India. 2016 

https://www.wordsandworldsmagazine.com/archive-1/fall-issue-2016-herbst-ausgabe-2016/mohan-rana/


Friday, August 11, 2017

ब्रांड


दलजीत नागरा की एक किताब का नाम है, ब्रिटिश म्यूज़ियम
फेबर महान कंपनी है । किताबों के बाज़ार में बड़ा नाम
जैसे रेडियो में फिलिप्स जूतों में बाटा
हाथी ब्रांड का आटा
और टाटा के ट्रक चाय और नमक

सड़कों पर नींद भी शायद
निर्जनों में बेहाल एकांत भी किसी का ब्रांड
किसी कवि का लिखा विज्ञापन
शाम की ख़बर की बाइट हो

पर पकौड़े खाने का मन था
नामों के पूरक नाम पर टूट पड़े एक किराने के दुकानदार पर
विकल्प जी अविकल रात दस बजे
उन्हें चाहिये था बेसन पर वहाँ ग्राम फ्लावर बिक रहा था
दुकान शर्मा जी की थी ब्रसेल्स में 
होशियारपुर में उनकी कभी राशन की दुकान भी होती थी
जिसका खाता वे साथ ले आए थे यादाश्त के लिए

हाँ तो कल कि मैट्रौ स्टेशन पर बात रुक गई थी
बड़े दिनों बाद मिले उसने जब कहा था!





- मोहन राणा

© 11 अगस्त 2017

Sunday, July 16, 2017

This Place is Enough

 Poem - MohanRana

 

This Place is Enough

Between two addresses, an undiscovered geography—
I wrote it, kept it aside, and bothering not to read
A face at first, then a second, and a third…
A story that was yours and mine remained an unfinished business
Like a corpus of drying clothes tossing in the wind
Like always, ripe with a miscellany of the unconsummated
In those pages, I tuck another day,
Turning them and then I walk away
Winter! A muffler around my neck
I turn back to inspect something, groping for my pocket
Feeling like a stranger to myself,
I disappear from the street into an alley
From the visible self, past the threshold of the door
Household, to courtyard, to solitude
In the guise of hope fear follows at each step
My shadow, like a receipt for arrivals and departures
So I have stopped
Here and there, between shadows, measuring my height
And then running with shackled feet, until
This place that is enough to stand, hide
And lie in silence
Or turn into the green doob grass.



Translation from Hindi by Arup K Chatterjee and Amrita Ajay.

Tuesday, July 11, 2017

कविता संग्रह 'शेष अनेक' की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद । Poems in English translations.

कविता संग्रह 'शेष अनेक' की कुछ कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद । Poems in english translations from the poetry collection 'Shesh Anek'.

अरुप के. चटर्जी और अमृता अजय ने कविता संग्रह 'शेष अनेक' की कुछ कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद

A Miscellany of the Unconsummated

कुछ दिनों पहले किये थे वे इस महीने   कोल्डनून पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।


Few poems are published in English translations  from Hindi by Arup K Chatterjee and Amrita Ajay in Coldnoon magazine this month.


Tuesday, April 25, 2017

दैनिक जागरण में समीक्षा

कविता संग्रह  "शेष अनेक" की  दैनिक जागरण में  स्मिता   की लिखी समीक्षा।























शेष अनेक (कविता संग्रह)

प्रकाशक -

कॉपर कॉइन पब्लिशिंग 

Saturday, December 31, 2016

नववर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाएँ।
Wish you a fulfilling and Joyous New Year 2017.


Thursday, October 20, 2016

ग्दांस्क , पोलैंड में कविता । A poem in Gdansk, Poland

ग्दांस्क , पोलैंड में कविता

[पारगमन]

मैं अतीत था फिर भी मैं सबको भूल जाऊँगा
मैं सब सुन लेता हूँ अब, मैं अनहद हो गया हूँ........

The Crossing

I'll forget all, even though I was the past

I hear all now, I have become the Primal Sound...


Przejście

Zapomnę wszystko, choć byłem przeszłością.
Teraz słyszę wszystko, stałem się Pradzwiękiem.
Sięgam wzrokiem daleko, stałem się horyzontem.
Choć oddaliłem się od wszystkiego,
nadal tak bliski aż niewidoczny; teraz jestem jednym w twoim oddechu.
Kukło z gliny, stałem się ziemią.

© Mohan Rana 2016

'Jo Quail with Cappella Gedanensis'

Sunday 23rd October,Gdansk, Poland

featuring poetry of Mohan_Rana, plus tracks from all albums!




Thursday, October 06, 2016

नई कविताएँ - मोहन राणा । New Poems - Mohan Rana

Three New Poems in Translation.


These three poems were translated from Hindi by Lucy Rosenstein and the Irish poet Bernard O’Donoghue.

खग्रास

हमने की कोशिश अँधेरे को मिटाने की
हो गए मंत्रमुग्ध चमकते बल्बों की चौंधियाहट से
कि नहीं दिखता कुछ भी उस चमकते अँधेरे में...

From 'Eclipse':

'Trying to overcome the dark,
we become dazzled by shining bulbs.
Nothing is visible in this glowing darkness,'

नक़्शानवीस

पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो
तुम एक ख़ामोश पहचान
जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश,
तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में...

From 'The Cartographer':

'Between the lines it’s you,
absent, but a silent presence
just as the rain is absent in the passing clouds.'

बावली धुन

रात थी सुबह हो गई
करवटों में भी नहीं मिली कोई जगह
यह ग़लत पतों की यात्रा है मेरे दोस्त...

From 'An Obsessive Tune':

'Night passed and the morning came,
though, tossing and turning, I got nowhere.
A journey, dear friend, to wrong places.'

कविताएँ -  POEMS
http://www.poetrytranslation.org/news/new-poems-by-mohan-rana





Thursday, September 01, 2016

मूल हिन्दी से कविता का जर्मन अनुवाद। A poem with German translation.

अंतराल

समय यहाँ क़दम नहीं उठाता
हम घूमते हैं उसके पाँवों पर 
नींद में सावधानी से चलना यह सोता नहीं है
न तो यह तुम्हारी और मेरी तरह कहीं आता जाता है 
पर हम कई बार आ कर गुज़र गए
अपनी परछाई के आगे पीछे 
यह ले रहा है साँस, यह जी रहा है हमारी साँसों पर
यह कभी मुस्कराता भी है
हम इसे भूल जाते हैं अतीत कह कर
पर इसे याद है भविष्य भी।

̶ मोहन राणा (*1964 , दिल्ली)
कविता 2010 में लिखी गई और 'शेष अनेक' 2016 में प्रकाशित, पृष्ठ 75

Zwischenzeit

Die Zeit erhebt ihren Schritt hier nicht
Wir umkreisen ihre Füße
Geh vorsichtig im Schlaf
Denn er ist keine heilende Quelle
Die Zeit läuft und kehrt nicht zurück
Wie Du und Ich
Aber wir, die Menschen, verlassen sogar
Den Schatten unseres eigenen Körpers
Nach vorn und nach hinten
Und umkreisen ihn immer wieder
Die Zeit atmet, sie lebt von unserem Atem
Und manchmal lacht sie auch
Wir nennen sie Vergangenheit
Und vergessen sie
Aber die Zeit weist sogar die Zukunft.
 


- Mohan Rana (*1964, Delhi)
Poem written in 2010 &  published in ‘Shesh Anek’ 2016, page 75.

Translation from Hindi to German : Ram Prasad Bhatt 


शेष अनेक (कविता संग्रह)
प्रकाशक -
कॉपर कॉइन पब्लिशिंग प्रा. लि.
ISBN 978-93-84109-05-9


Tuesday, May 17, 2016

कविता संग्रह 'शेष अनेक' का विमोचन : Launch of Poetry Collection "Shesh Anek"

शेष अनेक (कविता संग्रह), 2016
मोहन राणा
प्रकाशक : कॉपर कॉईन पब्लिशिंग

Shesh Anek ( Poetry Collection), 2016
Mohan Rana
Publisher : Copper Coin Publishing




15 मई 2016 को मुम्बई में प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे द्वारा कविता संग्रह 'शेष अनेक' का विमोचन

The Translator : Nothing is Translated in Love and War

  8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...