Saturday, August 06, 2011

खरगोश

इस अँधेरे में हम सुनते अपनी साँस
पर थोड़ी देर में वह भी बंद हो जाती सुनाई देना,
सुनते हैं अपनी धमनियों में रिसती पीड़ाएँ
पर थोड़ी देर में वे भी रुक जातीं रिसना
और अँधेरा मिट्टी और हम एक हो जाते

2002

© मोहन राणा