Saturday, May 01, 2010

मेरे पाँवों पर उगी है दूब

तुम दूर से मुझे देखो
तो दिखता हूँ पत्थर का बुत
नजदीक आ कर देखो
तो दिखता हूँ कंकड़ों का समझौता,

मेरे पाँवों पर उगी है दूब
ताजी बस अभी ही उगी.
हवा सीटियाँ बजाती
चुभोती है अपने नाखून मेरी देह में
और खुरचती है बारिश मेरी त्वचा,
मेरी नग्नता के भीतर से गुजरते हैं
कई आकाश और छायाएँ
लंबी घड़ियों से मुक्त कोई दोपहर
दिन को हटाती कोई शाम,
मेरे भीतर एक अधपकी रोटी है
तपा रही है धूप उसे
जाने कब से

हर दिन मैं याद करता हूँ अपने बारे में
भूल जाता हूँ
इच्छाओँ के नीचे ढकी हैं मेरी आँखें
जैसे बेलों के नीचे कोई दीवार उस दीवार पर हो सकते हैं
कई नाम
किसी जगह के दिशा संकेत,
कुछ मिटते निशान
कोई चिन्हा हुआ दरवाजा
मैं इन संभावनाओं पुष्टि नहीं कर सकता फिलहाल,

नहीं बोला वर्षों से
मैंने कोई शब्द
तुम नहीं सुन पाओगे मेरी आवाज
मैं भी नहीं सुन पाता
जाने किस शरद में पत्तों के साथ मेरे कान भी गिर गए

मेरे नजदीक आओ
लगाओ अपने कान मेरी छाती पर
शायद सुन पाओ धड़कन अपनी


14.12.1993 ©

Monday, March 29, 2010

एक समय

कुछ दिनों में आएगा एक मौसम
इस अक्षांस में
कुछ दिनों में आएगा एक समय,
जिसे याद रखने के लिए भूलना पड़ेगा सबकुछ
क्षणभंगुर भविष्य को जीते
मैंने अतीत को नहीं देखा है अब तक



©
29.3.2009

Thursday, March 25, 2010

पानी का चेहरा


चिमनी में करती रही बातें
हवा कल सारी रात
जंगलों की कहानियाँ
पहाड़ों की यातना
समुंदरों का सीत्कार
सो रही और कहीं जागती दुनिया के दुस्वप्न
उसके अल्पविरामों के बीच
झरती बरसों पहले बुझ चुके अंगारों की राख,
चुपचाप
नींद में भी
सुनता रहा अपने आप को समेटता
जूझता रहा उसकी उमंग से,

मैं अँधेरे में पानी का चेहरा था
पेड़ों और दीवारों पर बहता


© मोहन राणा

"धूप के अँधेरे में" (2008) से

Monday, March 22, 2010

इस बरस

जब हम बीच में होते हैं तो किनारों पे चली जाती हैं दूरियाँ,
पास आकर भी भूल जाता हूँ निकटता की बेचैनी
किनारों पर टहलते हुए.

इस बरस कैद कर लिया
पाताल की देवी ने बसंत,
फूटते हैं बर्फीले ज्वालामुखी
कुछ और दरारें चटखती सतहों में
गिरे हुए मलबों में अपना घर खोजते लोग
धुरी पर डगमगाती धरती
खो देती कुछ क्षण,
इन प्रदेशों में पतझर की खोज में
देर से आएगा बसंत

©मो.रा.


Tuesday, March 16, 2010

Translation

Does language convey anything? except translating the reality defined by the language. What is a translation? .. रुक जाती है सांस, आरंभ होता सपना
what happens, when we stop translating : the breath stops. The dream begins.

Saturday, February 20, 2010

शोक सभा में

बुदबुदाते शब्द झर कर गिर जाते अदृश्य धूल के कणों की तरह
चर्च के ठंडे फर्श पर
प्रार्थना के शब्द
शोक के शब्द
स्मृति के शब्द
अनुपस्थिति को उकेरते शब्द
विस्मृति की स्याही में
एकांत के शब्द


इस बार बसंत भी भूल गया जल्दी आना.
क्या मैं फुसफुसा दूँ कुछ तुम्हारे कानों में
(इस मृत्युलोक में जीवित देह)
इससे पहले कि तुम भूल जाओ इस जनम को
केवल हमारे लिए बुदबुदाते स्वरों के बीच


20.2.10 कविता - फोटो © मोहन राणा

Wednesday, February 17, 2010

कालापानी नीली लहरें

कर दो दान चुराया माल- भला करे भगवान
ना लिखे भी
ना सोचे भी
ना चीख पुकार के भी
नानाविध उपकरण और विधियाँ भी बेकार हैं
उपाय यही इस मन से मोक्ष का

अब खाली दानपात्र में बस बचा मैं ही हूँ
चुराता नहीं जिसे वहाँ से कोई ,
कभी कभी देखना भी जरूरी होता है
आइने को अपने अलावा भी

© मोहन राणा 17.2.10

Monday, February 15, 2010

खग्रास

हमने अँधेरे को मिटाने की कोशिश
पर गुलाम हो गए चमकते बल्बों की चौंधियाहट से
कि नहीं दिखता कुछ भी उस चमकते अँधेरे में,
गढ़ा एक नया अँधेरा जिसकी रोशनी में मिटा दिया दिन को
खिड़की पे खींच कर पर्दा

तुम्हारी निराशा को अपनी कोशिश में
ठीक करते करते मैं भूल भी गया अपनी गलतियों को
अगर तुम्हें मिले वह आशा का चकमक पत्थर इस घुप्प में टटोलते,
बंद कर देना बत्ती कमरे से बाहर जाते हुए
देखना चाहता हूँ अँधेरे को तारों की रोशनी में
बंद आँखों के भीतर.



© मोहन राणा 15.2.10

Friday, February 12, 2010

बावली धुन

रात थी सुबह हो गई
करवटों में भी नहीं मिली कोई जगह
गलत पतों की यात्रा यह मेरे दोस्त
रास्ता भूलना है तो साथ हो लो,
शर्त यही कि भूलना होगा अपना नाम पहले,
वैसे डर किसे नहीं लगता लोगों के भूल जाने का
याद दिलाते रहें जनम जनमों तक
उन्हें अपनी अनुपस्थिति की
कब होगी पहचान सपने और सच्चाई की
जागकर भी पता चले कैसे
जब सोया हो हर कोई आसपास
स्मृति की नींद में,
एक बावली धुन साथ है जो उतरती नहीं मन से.


© मोहन राणा

Wednesday, February 10, 2010

कविता ही फिलहाल

पनवाड़ी प्रकाशक हो गए परांठे वाली गली में
कवि के पान पर चूना लगाकर,
अलखनिरंजन
कह के कूदी अभिशप्त बरगद से एक छाया
मेरी जुबान बंद है
मेरे इन्कार में उपस्थित है उसका चेहरा,
रजाईयों में दुबकी अभिजात्य आत्माओँ ने
बंद कर ली अपनी आँखें अँधेरे से डर कर.


©मोहन राणा 10.2.10

Monday, February 01, 2010

चाँदनी रात में खामोशी

मैं सहमत हूँ
चाँदनी रात में खामोशी से
मन में सीत्कारती चिंताओँ से
दिल में कुछ ढोती बेचैनी से
कमर में किसी बोझ की अनुभूति से
मुझ से थक चुकी नींद से
मैं सहमत हूँ
तुम्हारे भय से
दिन के अँधेरे में चलते आर्तनाद से,
असहमतियों के साथ बैठे
इस स्थिति से सहमत हूँ
थक चुका हूँ कतारें बदलते बदलते

निश्चित नहीं है जीवन में आश्चर्य हमेशा
अगर किसी को मालूम हो घड़ी में निरंकुश समय बदलना
हो चुका है अतीत जो अब याद नहीं है भविष्य की तरह,
कितनी बार बदली सूईयाँ मैंने इसकी
हर बार मैँ ही गिरता
मैं ही चूकता
मैं ही भूलता
साबुन के बुलबुले उड़ाते

© मोहन राणा
31.1.10

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