जब सच केवल एक याद हो
लगातार भूलती हुई,
और जीता हो कोई उसे अपना समझ कर
किसी आयाम में
एक दिन यह रस्सी का सिरा छूट जाएगा मेरे हाथों से.
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चिमनी में करती रही बातें
हवा कल सारी रात
जंगलों की कहानियाँ
पहाड़ों की यातना
समुंदरों का सीत्कार
सो रही और कहीं जागती दुनिया के दुस्वप्न
उसके अल्पविरामों के बीच
झरती बरसों पहले बुझ चुके अंगारों की राख,
चुपचाप
नींद में भी
सुनता रहा अपने आप को समेटता
जूझता रहा उसकी उमंग से,
मैं अँधेरे में पानी का चेहरा था
पेड़ों और दीवारों पर बहता
© मोहन राणा
"धूप के अँधेरे में" (2008) से
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