Saturday, September 24, 2016

पॉडकास्ट : मोहन राणा की 12 हिन्दी कविताएँ । Podcast: 12 Hindi poems by Mohan Rana.

Listen to a playlist of 12 Hindi poems by Mohan Rana. The poems are read first in English translation by Bernard O'Donoghue and then in Hindi by Mohan himself.
https://soundcloud.com/poetrytranslationcentre/sets/mohan-rana-1

Thursday, September 15, 2016

'शेष अनेक' कविता संग्रह की समीक्षा। A celebration of elemental muse.

निसर्ग प्रेरणांचा उत्सव। A celebration of elemental muse.
'शेष अनेक' की दा.गो.काळे. द्वारा लिखित समीक्षा 'वाटसरू' [1 से 15 सितम्बर 2016 ] अंक में।
Review of 'Shesh Anek' in Watsaru Magazine ( 1-15 sept 2016)
by Damodar Kale.


Thursday, September 01, 2016

मूल हिन्दी से कविता का जर्मन अनुवाद। A poem with German translation.

अंतराल

समय यहाँ क़दम नहीं उठाता
हम घूमते हैं उसके पाँवों पर 
नींद में सावधानी से चलना यह सोता नहीं है
न तो यह तुम्हारी और मेरी तरह कहीं आता जाता है 
पर हम कई बार आ कर गुज़र गए
अपनी परछाई के आगे पीछे 
यह ले रहा है साँस, यह जी रहा है हमारी साँसों पर
यह कभी मुस्कराता भी है
हम इसे भूल जाते हैं अतीत कह कर
पर इसे याद है भविष्य भी।

̶ मोहन राणा (*1964 , दिल्ली)
कविता 2010 में लिखी गई और 'शेष अनेक' 2016 में प्रकाशित, पृष्ठ 75

Zwischenzeit

Die Zeit erhebt ihren Schritt hier nicht
Wir umkreisen ihre Füße
Geh vorsichtig im Schlaf
Denn er ist keine heilende Quelle
Die Zeit läuft und kehrt nicht zurück
Wie Du und Ich
Aber wir, die Menschen, verlassen sogar
Den Schatten unseres eigenen Körpers
Nach vorn und nach hinten
Und umkreisen ihn immer wieder
Die Zeit atmet, sie lebt von unserem Atem
Und manchmal lacht sie auch
Wir nennen sie Vergangenheit
Und vergessen sie
Aber die Zeit weist sogar die Zukunft.
 


- Mohan Rana (*1964, Delhi)
Poem written in 2010 &  published in ‘Shesh Anek’ 2016, page 75.

Translation from Hindi to German : Ram Prasad Bhatt 


शेष अनेक (कविता संग्रह)
प्रकाशक -
कॉपर कॉइन पब्लिशिंग प्रा. लि.
ISBN 978-93-84109-05-9


Saturday, July 30, 2016

लंदन में कविता पाठ । Poetry reading in London

'शेष अनेक ' से कुछ कविताओं  का पाठ। Reading some poems from '. Shesh Anek'

[प्रकाशक - कॉपर कॉईन /Publisher - Copper Coin]

THE INTERNATIONAL HOT SUMMER SHUFFLE
Saturday 30 July 2016, 7:30 pm – 9:30 pm

Booking information.

Entry £6/4

Venue

The Poetry Café
  22 Betterton Street
  London, WC2H 9BX United Kingdom

http://poetrysociety.org.uk/event/the-international-hot-summer-shuffle/


Tuesday, June 21, 2016

कविता संग्रह अमेज़न पर

'शेष अनेक' की जो लेखकीय पाँच प्रतियाँ यहाँ पहुँची वे हवा लगते ही फुर्र हो गईं। अब कविता संग्रह अमेज़न पर उपलब्ध है।
Now available to buy from Amazon site.

http://www.amazon.in/gp/product/9384109053


Wednesday, June 15, 2016

शेष अनेक – मोहन राणा



शेष अनेक  – मोहन राणा 

- गोबिन्द प्रसाद





मोहन राणा अपनी पीढ़ी के उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने आठवें दशक के बाद की कविता के परिदृश्य को अपनी काव्यात्मक उपस्थिति से बहुत कुछ बदल दिया है। यूँ तो काव्य विषय अपनी मूल प्रकृति में वही रहते हैं। फिर भी, काव्य-विषय बहुत कुछ वही होने पर भी कवि अपनी दृष्टि का नया आसव भरकर इनमें एक नई दीप्ति, एक नया आस्वाद भर देता है। हर समर्थ कवि जैसे ही किसी चीज़, वस्तु, दृश्य, मनुष्य, प्रकृति अर्थात गोचर-अगोचर संसार को देखता है तो वह प्रायः बदल जाती है। कहने का अभिप्राय यह कि वह ;  ‘वह’ नहीं रह जाती कवि के देखने से पूर्व जो वह थी। यही वह काव्य दृष्टि है - इसी को काव्य बोध या काव्य अनुभूति का विधान भी कह सकते हैं। मोहन राणा भी उन कवियों में से हैं जो जिस  चीज़ को अपनी दृष्टि की परिधि में लाते हैं उसे अपने देखने भर से ही वे उन चीज़ों के रंग, रूप, रुख़ और उनका किरदार बदल देते हैं।

चीज़ों का यह चरित्र बदल देना आसान काम नहीं. लेकिन मोहन राणा अपनी कविताओँ में यह काम बहुत सहज  करते दिखाई देते पड़ते हैं।  हालाँकि एक कवि होने के नाते मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि यह काम उतना आसान नहीं है जितना प्रतीत होता है इसके पीछे एक ख़ासे लंबे तज्रबे और मश्क की जद्दो-जेहद छिपी रहती है। इस सहजता  को साधने में उनकी भाषा बहुत साथ देती है , उनकी काव्य संवेदना का।  उन्होंने जो भाषा अपने लिए बनाई है या चुनी है उसकी अपनी एक भूमिका है संवेदन का जगाने की दिशा में। बिम्ब –प्रतीक अथवा मिथक आदि से कविता बनाने के प्रचलित साँचेबद्ध फ़ार्मूले में अपने को बिना बाँधे और बिना  रिड्यूस किए ही वे अपनी संवेदना को मूर्त करते चलते हैं। यह उनकी अनुभूति के नए विधान और तदनुकूल उसे संप्रेषित करने वाले भाषिक-विन्यास और कौशल का ही कमाल है।

मोहन राणा की कविताओं मे सामाजिक सरोकार और जीवन का यथार्थ यांत्रिक रूप से बहुत ठोस नहीं दिखाई पड़ता।  कारण यह कि वे यथार्थ को बहुत सतही और  स्थूल धरातल पर पकड़ने के बजाय उसे उसके भीतरी रूप में पकड़ने का प्रयास करते हैं।  उनकी कविताओं में बयान का तौर-तरीक़ा कुछ ऐसा है कि लगता है यथार्थ की ठोस मोटी चादर के बजाय उनकी काव्य संवेदना सपनीले जल से जैसे झाँकती है। गोचर-अगोचर संसार के स्पंदित रूप, अभाव –आकांक्षाओं से भरी स्मृति-विस्मृतियाँ और मानवीय सह सम्बंधों के तमाम चेहरे वे अपनी इसी अर्जित शैली में आँकते चलते हैं।

शेष अनेक  (कविता संग्रह)
मोहन राणा
© 2016
कॉपर कॉईन पब्लिशिंग 
ISBN 978-93-84109-05-9
 
शेष अनेक ( Shesh Anek)
Poetry collection by Mohan Rana
Publisher
Copper Coin Publishing
© 2016 मोहन राणा
ISBN 978-93-84109-05-9

Copper Coin Publishing

Ramkrishna Nagar
Shegaon 444 203
Buldhana
India

Sales: sales@coppercoin.co.in
Information: info@coppercoin.co.in
 

Tuesday, May 17, 2016

कविता संग्रह 'शेष अनेक' का विमोचन : Launch of Poetry Collection "Shesh Anek"

शेष अनेक (कविता संग्रह), 2016
मोहन राणा
प्रकाशक : कॉपर कॉईन पब्लिशिंग

Shesh Anek ( Poetry Collection), 2016
Mohan Rana
Publisher : Copper Coin Publishing




15 मई 2016 को मुम्बई में प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे द्वारा कविता संग्रह 'शेष अनेक' का विमोचन

Saturday, May 14, 2016

शेष अनेक

मेरे नये कविता संग्रह "शेष अनेक" का 15 मई 2016 को मुम्बई में विमोचन होगा।
इसे कॉपर कॉईन पब्लिशिंग ने प्रकाशित किया है।

Launch of my new poetry collection शेष अनेक [Shesh Anek] in Mumbai on 15th May 2016. This collection is published by Copper Coin Publishing.

शेष अनेक ( कविता संग्रह), 2016

Monday, February 01, 2016

सौ फूलों को खिलने दो

पर फूलदान में किसको लगाएँ
देवालय में किसको चढ़ायें,
बिल्ली के गले कौन बांधेगा डर के घंटी
कोई नाम सोचते हम हँसते रहेंगे दुस्वपन देखते,
इतिहास अपनी चुप्पी में भी करेगा सवाल
चेतावनियों के कान इतने क्यों बहरे


© मोहन राणा
शेष अनेक (कविता संग्रह) 2016

Saturday, December 12, 2015

तभी तो


इतने महीन दिन महीन बातों में
कि सच भी पारदर्शी हो गया,
झूठ पर अब शक नहीं होता
सुबह आइना देखते ही दुनिया से शाया करते हुए,
अब संतोष होता है।

समय कम है लोग कम हैं पर कहानियाँ कई 
सुनकर अधसुनी लिख अधूरी कि घट चुके भविष्य को आँखें नहीं देख पातीं हाशियों में पढ़ते,
जो सुनाकर भी  नहीं होती पूरी
उनके और मेरे दिनों का याद किया जमा जोड़ में भी
जो ख़ुद ब ख़ुद घटता रहता है रेत के पहाड़ में अपने कदमों को रोंदते,
सड़क का दूसरा किनारा रह जाता है जीवन में उस पार ही।


© मोहन राणा
14.12.2015

The Translator : Nothing is Translated in Love and War

  8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...