Monday, March 19, 2007
प्रस्तरो भविता नदी
विष्णुललित जी ने एक श्लोक मेरे संग्रह "पत्थर हो जाएगी नदी" को पढ़ने के उपरांत पांडिचेरी में मुझे लिखकर दिया.
Tuesday, January 30, 2007
दिन अच्छा था

दिन रोज आते हैं पर कभी कोई दिन अच्छा निकल आता है, उसे उठाता हूँ कि देखूँ जरा गौर से कि वह फिर समय की नदी में बह जाता है..
एक कविता ("इतना कुछ एक साथ " कविता संग्रह से )
धोबी
चमकती हुई धूप सुबह की
चीरती घने बादलों को चुपचाप
देखते भूल गया मैं आकाश को
दुखते हुए हाथों को,
पानी में डबडबाते प्रतिबिम्ब की सलवटें देखते
मैं भूल गया
अपनी उर्म को,
झूमती हुई हरियाली में लहुलुहान छायाओं को देखते
भूल गया मृतकों के वर्तमान को
जो सोचा करने लगा कुछ और,
घोलता नीले आकाश में बादलों के झाबे को
मैं धो रहा हूँ अपने को
1.5.2003
© मोहन राणा
Monday, January 08, 2007
हिन्दी टूलकिट
हिन्दी के प्रयोग और प्रसार में एक और सराहनीय काम डॉउन लोड के लिए उपलब्ध है
"नया हिन्दी टूलकिट इंस्टालर" http://himanshu.blogiya.com/archives/100
मैंने इसे जाँचा नहीं है क्योंकि यूनीकोड का प्रयोग मैं पहले ही कर रहा हूँ पर जो यूनीकोड का प्रयोग करना चाहते हैं उनके लिए इस टूलकिट के विवरण के अनुसार - यह उपयोगी और सुविधाजनक उपकरण लगता है.
हिन्दी भाषा की स्थिति के बारे पिछले कुछ सप्ताहों में काफी कुछ पढ़ने सुनने और बतियाने का अवसर मिला.. बात कुछ ऐसी सी है...
जब हिन्दी का चना चबाने वाले ही अपने दांत स्वंय तोड़ने में लगे हैं तो डैंटिस्ट को दोष देना मूर्खता की बात है.
"नया हिन्दी टूलकिट इंस्टालर" http://himanshu.blogiya.com/archives/100
मैंने इसे जाँचा नहीं है क्योंकि यूनीकोड का प्रयोग मैं पहले ही कर रहा हूँ पर जो यूनीकोड का प्रयोग करना चाहते हैं उनके लिए इस टूलकिट के विवरण के अनुसार - यह उपयोगी और सुविधाजनक उपकरण लगता है.
हिन्दी भाषा की स्थिति के बारे पिछले कुछ सप्ताहों में काफी कुछ पढ़ने सुनने और बतियाने का अवसर मिला.. बात कुछ ऐसी सी है...
जब हिन्दी का चना चबाने वाले ही अपने दांत स्वंय तोड़ने में लगे हैं तो डैंटिस्ट को दोष देना मूर्खता की बात है.
शब्द
Friday, January 05, 2007
हिन्दी लेखक उर्फ एक दिन
हिन्दी में बस विभूतियों का जीवन परिचय रह जाएगा दसवीं कक्षा की परीक्षाओं के लिए..
कुछ दिन पहले एक लेखक संघ की बैठक की रपट पढ़ी,
उसमें जो प्रस्ताव पारित किए गए पढ़ कर मैं दंग रह गया...सोचने लगा
यह लेखकों के हित में काम करने वाला संगठन है या किसी राजनैतिक दल की शाखा..
अंग्रेजी में कहावत है If You Pay Peanuts, You Get Monkeys.
एक प्रकाशक से जब मैंने कुछ साल पहले रायल्टी की बात कही तो उनके चेहरे पर
एक अचरज का भाव आया... जैसे वह शब्द उन्होंने पहली बार सुना हो..
कर दिया ना खेल खराब मैंने बाद में सोचा, अब अगली किताब छापने में अनाकानी यह प्रकाशक करेगा.. और हालत भी ऐसी है ना, पिछले साल दिल्ली में एक गोष्ठी में जाने का अवसर मुझे मिला... वहाँ जो "साहित्यकार" वो या तो विश्वविद्यालय में हिन्दी का प्राध्यापक/ प्राध्यपिका या कोई सरकारी अधिकारी और साहब हर किसी की किताब प्रकाशक के पास लगी हुई है... कुछ कुछ किसी कल्ब जैसा माहौल वहाँ...
और उनके अड़ोसी पड़ोसी तक को पता नहीं कि कोई "साहित्यकार" उनके बीच में हैं...
एक पत्रिका के दफ्तर में यह मुझे एक "सीरियस" साहित्यकार ने गंभीर मुद्रा में चेताया कि देखिए क्या स्थिति है!
..'समाज में (हिन्दी)लेखक की उपस्थिति दर्ज ही नहीं कहीं भी..' फिर हम दोनों एक लंबे
मौन में ठहर गए, फंसे रह जाते उस मूक अंतराल में, पर सौभाग्यवश तभी उनका सहायक कमरे में चाय ले आया.
ऐसा क्यों है कि "सच" को जानकर हमें गुस्सा ही आता है जबकि उसकी तलाश में हम बावले हुए जा रहे हैं.
.. यह भी संभव है कि शायद दसवीं कक्षा की हिन्दी परीक्षाएँ हों ही ना, एक दिन.
"जॉब" के लिए हिन्दी पढ़ना लिखना आवश्यक थोड़े ही है.
वैसे भी ज्यादा सोचने से "हैडएक" हो जाता है.
कुछ दिन पहले एक लेखक संघ की बैठक की रपट पढ़ी,
उसमें जो प्रस्ताव पारित किए गए पढ़ कर मैं दंग रह गया...सोचने लगा
यह लेखकों के हित में काम करने वाला संगठन है या किसी राजनैतिक दल की शाखा..
अंग्रेजी में कहावत है If You Pay Peanuts, You Get Monkeys.
एक प्रकाशक से जब मैंने कुछ साल पहले रायल्टी की बात कही तो उनके चेहरे पर
एक अचरज का भाव आया... जैसे वह शब्द उन्होंने पहली बार सुना हो..
कर दिया ना खेल खराब मैंने बाद में सोचा, अब अगली किताब छापने में अनाकानी यह प्रकाशक करेगा.. और हालत भी ऐसी है ना, पिछले साल दिल्ली में एक गोष्ठी में जाने का अवसर मुझे मिला... वहाँ जो "साहित्यकार" वो या तो विश्वविद्यालय में हिन्दी का प्राध्यापक/ प्राध्यपिका या कोई सरकारी अधिकारी और साहब हर किसी की किताब प्रकाशक के पास लगी हुई है... कुछ कुछ किसी कल्ब जैसा माहौल वहाँ...
और उनके अड़ोसी पड़ोसी तक को पता नहीं कि कोई "साहित्यकार" उनके बीच में हैं...
एक पत्रिका के दफ्तर में यह मुझे एक "सीरियस" साहित्यकार ने गंभीर मुद्रा में चेताया कि देखिए क्या स्थिति है!
..'समाज में (हिन्दी)लेखक की उपस्थिति दर्ज ही नहीं कहीं भी..' फिर हम दोनों एक लंबे
मौन में ठहर गए, फंसे रह जाते उस मूक अंतराल में, पर सौभाग्यवश तभी उनका सहायक कमरे में चाय ले आया.
ऐसा क्यों है कि "सच" को जानकर हमें गुस्सा ही आता है जबकि उसकी तलाश में हम बावले हुए जा रहे हैं.
.. यह भी संभव है कि शायद दसवीं कक्षा की हिन्दी परीक्षाएँ हों ही ना, एक दिन.
"जॉब" के लिए हिन्दी पढ़ना लिखना आवश्यक थोड़े ही है.
वैसे भी ज्यादा सोचने से "हैडएक" हो जाता है.
Monday, January 01, 2007
नववर्ष 2007
Saturday, December 16, 2006
जलवायु
आवरण
Tuesday, November 21, 2006
पुर्नपाठ
Sunday, November 19, 2006
मध्यावकाश

एकाएक शरद का रूप
प्रकट होता
सुर्ख पीला और गीला
गिरे गलते पतझर पर संभल कर पैर रखता
उतरता ढलान पर
बढ़ता शहर को
पास आता कोलाहल खो कर अपना मंतव्य
केवल शोर.. हर भाषा में शोर
सुनते थोड़ा ध्यान से एक एक कदम
मैं गिर कर नहीं देखना चाहता आकाश को,
बस मन है अभी धरती पर चलने का
बिना भय के
बिना किसी आशंका के
बिना अनजाने आंतक को छुए,
बस देखना मोहक शरद को
समेटते वसंत की स्मृति को धौंकते रंगों के साथ,
लेते एक लंबी सांस.
कि तभी मोबाइल बजने लगा
कहाँ हैं ? कोई प्रश्न
जी सड़क पर हूँ! एक जवाब
हँसता फिर एक और सवाल
क्या घर से बाहर कर दिया?
नहीं घर से तो बाहर हूँ
पहले ही !
फिर वही हँसी पर कोई और प्रश्न नहीं विदेश में!
बस एक बात
क्या कुछ छूट तो नहीं गया इस मध्यावकाश में
- पत्तों की खड़खड़ाहट अकेली
कोई पहचान पुरानी
17.11.06 © मोहन राणा
Saturday, November 18, 2006
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