Friday, February 10, 2006

बस एक पल का अंतर

बचपन में यानि कल , हम एक संस्कृत का श्लोक सुना करते थे,
वह हमें समझाने के लिए बताया जाता था अक्सर जब देर से कभी उठने पर तो....

काकचेष्टा वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च | अल्पहारी गृह्त्यागी विद्यार्थी पंचलक्षण्म् ।|

पर हमने कभी इस ज्ञान का पालन नहीं किया
जिंदगी ही इतनी ज्यादा पसरी हुई है कि इन पाँच नियमों को याद रखने की फुरसत कहाँ,
भूल गए उन्हें इस लिए यह याद है.

आजकल नींद एक बजे के बाद कभी आती है, और सुबह अपने समय पर।
जागने और सोने में जैसे बस एक पल का अंतर, अवगम ।