Saturday, April 29, 2006

आविष्कार

तपती गलती उकेरी हुई धरती,सूखती ,दलदल कहीं रेत के ववंडर झेलती,
करती प्रतीक्षा उसके उदूघाटन का, तय करती कविता अपना जनम खुद ही