Wednesday, March 12, 2008

वसुधैव कुटुम्बकम्

पृथ्वी के अलावा कोई और घर मनुष्यों के लिए अभी नहीं है, खोज चल रही है पर किसी और घर की संभावनाएँ कई प्रकाशवर्षों की दूरियों पर हैं.
जलवायु परिवर्तन का अभिघात आरंभ हो चुका है.. हालाँकि जलवायु परिवर्तन से जुड़े पारित प्रस्तावों की स्याही अभी सूखी भी नहीं .. मेरे तेरे की बहसों में समय बीत रहा है

अयं निजो परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

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