Sunday, April 08, 2007

टिप्पणी

"पत्थर हो जाएगी नदी" पर एक छोटी टिप्पणी "अमर उजाला " में कुछ दिन पहले छपी, यह पाँचवाँ संग्रह है पर समीक्षक इसे चौथा बता रहा है?! ....क्या यह गिनती का सवाल है ?
तथापि उन्हें किताब अच्छी लगी ऐसा प्रतीत होता है.

http://www.amarujala.com/Aakhar/detail.asp?section_id=11&id=327

Thursday, April 05, 2007

स्पाइस जेट




खिड़की पर अपना चेहरा सटा कर मैंने कुछ पहचानने की कोशिश की.... 30 हजार फीट से भी भला कोई पहचान हो सकती है, आकाश फिर भी उतना ही दूर लगता है जितना पैदल चलते कोलाहल से और बादल अलौकिक! हवाई जहाज शायद मध्यप्रदेश के ऊपर होगा, मैंने सोचा . चमकती हुई रोशनी में कुछ बादल नीले आकाश पर बिखरे और नीचे मध्य भारत का धुंधला भूगोल. पीछे वाली कुर्सियों पर लगभग हर कोई सो चुका था, आगे वाली कुर्सी पर दो बच्चे ऊधम में लगे थे . बच्चों के माँ- बाप आपस में अंग्रेजी में संवाद कर रहे थे बीच बीच में वे बच्चों को र्निदेश देते - फिर अपने साथ यात्रा कर रही बच्चों की आया से हिन्दी में कुछ कहते... मैं सोचने लगा मालिक- नौकर की भाषाएँ अलग -अलग हैं !?

भारत में हिन्दी किसकी भाषा है या नहीं है ?


बादल कुछ देर तक जैसे साथ उड़ते रहे. मैं बेंगलौर के बारे में सोचने लगा जहाँ मैं पहली बार जा रहा था.

Sunday, April 01, 2007

सीटी


कल बगीचे में रसभरी के पौधे लगाने के लिए खुदाई कर रहा था कि एक पुरानी सीटी मिट्टी में दबी मिली. जाने कब से यह पड़ी होगी मैंने सोचा ,

दबी हुई सुनती धरती की धड़कन, चुपचाप.
सुबह शाम बीते कई मौसम कि बरस कई,
गया इतना कि नहीं उसकी स्मृति कहीं,
पर सीटी तो चेतावनी देने के लिए होती है..







© मोहन राणा 1.4.07

Monday, March 19, 2007

प्रस्तरो भविता नदी

विष्णुललित जी ने एक श्लोक मेरे संग्रह "पत्थर हो जाएगी नदी" को पढ़ने के उपरांत पांडिचेरी में मुझे लिखकर दिया.

Tuesday, January 30, 2007

दिन अच्छा था


दिन रोज आते हैं पर कभी कोई दिन अच्छा निकल आता है, उसे उठाता हूँ कि देखूँ जरा गौर से कि वह फिर समय की नदी में बह जाता है..


एक कविता ("इतना कुछ एक साथ " कविता संग्रह से )




धोबी

चमकती हुई धूप सुबह की

चीरती घने बादलों को चुपचाप

देखते भूल गया मैं आकाश को

दुखते हुए हाथों को,

पानी में डबडबाते प्रतिबिम्ब की सलवटें देखते

मैं भूल गया

अपनी उर्म को,

झूमती हुई हरियाली में लहुलुहान छायाओं को देखते

भूल गया मृतकों के वर्तमान को

जो सोचा करने लगा कुछ और,

घोलता नीले आकाश में बादलों के झाबे को

मैं धो रहा हूँ अपने को

1.5.2003


© मोहन राणा




Monday, January 08, 2007

हिन्दी टूलकिट

हिन्दी के प्रयोग और प्रसार में एक और सराहनीय काम डॉउन लोड के लिए उपलब्ध है
"नया हिन्दी टूलकिट इंस्टालर" http://himanshu.blogiya.com/archives/100
मैंने इसे जाँचा नहीं है क्योंकि यूनीकोड का प्रयोग मैं पहले ही कर रहा हूँ पर जो यूनीकोड का प्रयोग करना चाहते हैं उनके लिए इस टूलकिट के विवरण के अनुसार - यह उपयोगी और सुविधाजनक उपकरण लगता है.

हिन्दी भाषा की स्थिति के बारे पिछले कुछ सप्ताहों में काफी कुछ पढ़ने सुनने और बतियाने का अवसर मिला.. बात कुछ ऐसी सी है...
जब हिन्दी का चना चबाने वाले ही अपने दांत स्वंय तोड़ने में लगे हैं तो डैंटिस्ट को दोष देना मूर्खता की बात है.

शब्द



















शब्द जीवन को प्रकाशित करते हैं, और मौन हमेशा उपस्थित है
पर्यवेक्षक की तरह...
क्या उनके बिना सुबह संभव है!


शब्द के महत्व को आचार्य दण्डी ने इस प्रकार व्यक्त किया है.

इदम् अन्धं तमः कृत्स्नम् जायेतभुवन त्रयम्।
यदि शब्दाव्हयम् ज्योतिरासंसारं न दीप्यते।।

(काव्यदर्श)

Friday, January 05, 2007

हिन्दी लेखक उर्फ एक दिन

हिन्दी में बस विभूतियों का जीवन परिचय रह जाएगा दसवीं कक्षा की परीक्षाओं के लिए..

कुछ दिन पहले एक लेखक संघ की बैठक की रपट पढ़ी,
उसमें जो प्रस्ताव पारित किए गए पढ़ कर मैं दंग रह गया...सोचने लगा
यह लेखकों के हित में काम करने वाला संगठन है या किसी राजनैतिक दल की शाखा..

अंग्रेजी में कहावत है If You Pay Peanuts, You Get Monkeys.

एक प्रकाशक से जब मैंने कुछ साल पहले रायल्टी की बात कही तो उनके चेहरे पर
एक अचरज का भाव आया... जैसे वह शब्द उन्होंने पहली बार सुना हो..
कर दिया ना खेल खराब मैंने बाद में सोचा, अब अगली किताब छापने में अनाकानी यह प्रकाशक करेगा.. और हालत भी ऐसी है ना, पिछले साल दिल्ली में एक गोष्ठी में जाने का अवसर मुझे मिला... वहाँ जो "साहित्यकार" वो या तो विश्वविद्यालय में हिन्दी का प्राध्यापक/ प्राध्यपिका या कोई सरकारी अधिकारी और साहब हर किसी की किताब प्रकाशक के पास लगी हुई है... कुछ कुछ किसी कल्ब जैसा माहौल वहाँ...
और उनके अड़ोसी पड़ोसी तक को पता नहीं कि कोई "साहित्यकार" उनके बीच में हैं...
एक पत्रिका के दफ्तर में यह मुझे एक "सीरियस" साहित्यकार ने गंभीर मुद्रा में चेताया कि देखिए क्या स्थिति है!
..'समाज में (हिन्दी)लेखक की उपस्थिति दर्ज ही नहीं कहीं भी..' फिर हम दोनों एक लंबे
मौन में ठहर गए, फंसे रह जाते उस मूक अंतराल में, पर सौभाग्यवश तभी उनका सहायक कमरे में चाय ले आया.


ऐसा क्यों है कि "सच" को जानकर हमें गुस्सा ही आता है जबकि उसकी तलाश में हम बावले हुए जा रहे हैं.

.. यह भी संभव है कि शायद दसवीं कक्षा की हिन्दी परीक्षाएँ हों ही ना, एक दिन.

"जॉब" के लिए हिन्दी पढ़ना लिखना आवश्यक थोड़े ही है.

वैसे भी ज्यादा सोचने से "हैडएक" हो जाता है.

Monday, January 01, 2007

नववर्ष 2007

पहली जनवरी 2007 , सुबह धूप निकली, कुछ देर ही सही, निकली तो, यही सोचते दोपहर हो गई, कि फिर आए बादल और एक मूसलाधार बारिश -

नववर्ष की मंगल कामनाएँ !

Saturday, December 16, 2006

जलवायु

दिसंबर के मध्य में ठंड अनुपस्थित है - जलवायु में परिवर्तन हो रहा है, बाहर नीलक के पेड़ में कोंपले निकल रही हैं,
वसंत 4 महीने पहले आ गया !???


कुछ हो रहा है -
या जो होने वाला है उसका संकेत

आवरण

कुछ दिन पहले मैंने कहानीकार -कवि उदयप्रकाश को अपने नए संग्रह की सूचना दी उनसे तुरंत एक ईमेल मिला जिसके साथ एक चित्र भी संलग्न था, उन्होंने संग्रह के आवरण का एक नया आईडिया डेवलप किया -

The Translator : Nothing is Translated in Love and War

  8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...