"तिब्बत की आजादी भारत की सुरक्षा".. यह कहते हुए उगिन हँस पड़ता है. जैसे अचानक उसे कुछ याद आया पहले इस बोध पर विस्मय और फिर उसी पल खगोलीय वास्तविकताओं की पहचान कर एक उदासी.
ताकती उनकी खुली आंखें सफेद आकाश को चलते चलते वे जैसे रूक गए पार्क की ढलान पर संभवी मुद्रा में पेडो़ं के बीच
ठिठका उन्हें देख कहीं वे लोग जनमे हो जैसे इस बार जल चेतना में मुझ से डर कर तो नहीं बन गए बर्फानी बुत वे सोचते होंगे कैमरे के लेंस से अपलक उन्हें देखता है कोई हिममानव?
31 दिसंबर की सुबह जमे हुए पाले में प्रकट हुई, बाहर कुहासे में ठिठुरता हुआ सन्नाटा. बगीचे में एक मैग्पाइ (मुटरी) उड़कर शंकु वृक्ष के शिखर पर बैठ गई. हमेशा सतर्क रहने वाली चिड़िया, चुपके से उसकी दो तीन तस्वीरें ले ली. इसे चालाक और चोर चिड़िया लोग कहते हैं क्योंकि इसके घोंसले में चमकीली चीजें पाई जाती हैं. पर चीन में मैग्पाइ को शुभ माना जाता है.
सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया को पढ़ता हूँ खबरों की सूची में एक खबर पर नजर पड़ती है 'मंजीत बावा नहीं रहे', वे पिछले तीन साल से कोमा में थे. मुझे 1986-90 के दौरान उनसे हुई मुलाकातें ध्यान आने लगती हैं रवीन्द्रभवन, गढ़ी स्टूडियो, धूमीमल गैलरी,त्रिवेणी या कहीं रास्ते में. स्मृतियों के डिब्बे में बोलती पड़ती हैं आवाजें, चल पड़ती हैं मानसिक चित्रपट की खिड़कियों में कुछ रीलें... और बाहर एक रंगहीन ठंडा आकाश, उदास धूप की कुछ कतरनें
यहाँ तो बारिश होती रही लगातार कई दिनों से जैसे वह धो रही हो हमारे दागों को जो छूटते ही नहीं बस बदरंग होते जा रहे हैं कमीज पर जिसे पहनते हुए कई मौसम गुजर चुके जिनकी स्मृतियाँ भी मिट चुकी हैं दीवारों से
कि ना यह गरमी का मौसम ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ,
शायद कोई रंग ही ना बचे किसी सदी में इतनी बारिश के बाद यह कमीज तब पानी के रंग की होगी !