Saturday, December 16, 2006

आवरण

कुछ दिन पहले मैंने कहानीकार -कवि उदयप्रकाश को अपने नए संग्रह की सूचना दी उनसे तुरंत एक ईमेल मिला जिसके साथ एक चित्र भी संलग्न था, उन्होंने संग्रह के आवरण का एक नया आईडिया डेवलप किया -

Tuesday, November 21, 2006

पुर्नपाठ


जानना


रात में पार करता छतें
छाया की तरह वह पक्षी

उत्तर के तारा समूह में
चमकता वह तारा
किताबों में नहीं हैं सब नाम,
आना जाना!

पहाड़ों में चलते
यह जाना



( कविता संग्रह "जगह" से पृष्ठ 39, जयश्री प्रकाशन,1994)

© मोहन राणा

Sunday, November 19, 2006

मध्यावकाश



एकाएक शरद का रूप
प्रकट होता
सुर्ख पीला और गीला
गिरे गलते पतझर पर संभल कर पैर रखता
उतरता ढलान पर
बढ़ता शहर को
पास आता कोलाहल खो कर अपना मंतव्य
केवल शोर.. हर भाषा में शोर
सुनते थोड़ा ध्यान से एक एक कदम

मैं गिर कर नहीं देखना चाहता आकाश को,
बस मन है अभी धरती पर चलने का
बिना भय के
बिना किसी आशंका के
बिना अनजाने आंतक को छुए,
बस देखना मोहक शरद को
समेटते वसंत की स्मृति को धौंकते रंगों के साथ,
लेते एक लंबी सांस.

कि तभी मोबाइल बजने लगा

कहाँ हैं ? कोई प्रश्न

जी सड़क पर हूँ! एक जवाब

हँसता फिर एक और सवाल
क्या घर से बाहर कर दिया?

नहीं घर से तो बाहर हूँ
पहले ही !
फिर वही हँसी पर कोई और प्रश्न नहीं विदेश में!
बस एक बात
क्या कुछ छूट तो नहीं गया इस मध्यावकाश में
- पत्तों की खड़खड़ाहट अकेली
कोई पहचान पुरानी



17.11.06 © मोहन राणा

Saturday, November 18, 2006

नवंबर- दो हजार छह


एक वसंत था कभी
पतझर अब,
लौटेगा फिर कभी




18.11.06

©

Monday, November 13, 2006

लंदन में एक शाम हिन्दी

बुधवार 8 नवंबर 2006 नेहरू केंद्र लंदन में हिन्दी के भविष्य पर चर्चा ...कुछ प्रस्ताव ...deja vu

क्या दुनिया हिन्दी बोलना सुनना चाहती है? या यह बस हमारे मन में चल रही ही किसी बंदर की बतियाहट है!

और हाँ

विदेश राज्य मंत्री श्री आनंद शर्मा भी वहाँ आए



रायपुर से आए साहित्यकारों के साथ




सृजनगाथा के संपादक जयप्रकाश मानस भी आए थे उन्होंने एक विशेष संग्रह - ब्रिटेन में हिन्दी कविता http://www.srijangatha.com/november/pravashiank.nov06.htm पर संपादित किया है.




वहाँ कुछ अपरिचित भी मिले और परिचित हो गए.

Friday, October 27, 2006

क्या होता!


बस चलते चलते आता है,
यही मन में
क्या होता!
सवाल अगर आप न करते

या यह भी समय का किया है
पहले से ही तय

मैंने पानी से लिखा उन्हें
वे बादलों में बदल गए

कहीं दूर की यात्रा पे,

सारा आकाश उनका
सारी धरती उनकी


किसी ने देखा सपना
और मैं कहता उसे अपना जीवन




27.10.06 © मोहन राणा

Thursday, October 26, 2006

कला दीर्घा की छत और तीसरा आदमी

कल कई मूड एक साथ चल रहे थे और बाहर बारिश, कागजों में कुछ खोजते बीनते एक अप्रकाशित कविता मिल गई और सारा कोलाहल गायब हो गया

कला दीर्घा की छत और तीसरा आदमी

थोड़ी ठंड है यहाँ जनवरी का महीना पर शांत है यह जगह
आओ अंधेरे आकाश को पंखी की तरह ओढ़ लें
कोहरे के सहारे हम चल पड़ें
कुछ देर दो बात ही कर लें समय के तंग रास्ते पर,
बिल्कुल उधर कोने में बांस की परछत्ती सी है मेरी
कुटिया घर की छत पर, उसने अचरज की सांस सी
अनायास दिख जाती हैं ऐसे ही मिलती जुलती चीजें और लोग कभी
सब कुछ मिलता जुलता ही होता है - थोड़ा हेर फेर होता होता है देखने में,

पर हमने कहा नहीं कुछ बना सुने कुछ
कोई तीसरा जो उपस्थित नहीं था कहता रहा अपने जीवन की -
घर के ऊपर घर से अलग वही एक जगह
घर से जुड़ी - मैं लिख रहा हूँ किताब वहाँ, उसने कहा
दिन भर मैं खोजता बीनता उन्हें - उन परित्यक्त शब्दों को जीवन में,
परछत्ती पर जमा होते
मैं रहता हूँ परित्यक्त शब्दों में - परित्यक्त शब्द
बिना तारों का आकाश उनमें, कई मौसम, वे मेरी और तुम्हारी तरह हैं
उनका न पता -ठिकाना, उनकी क्या उर्म है, उनका बस पहचान है , वे इश्तहार में - खोए
चेहरे से हैं.

कभी लगता है जैसे मेरी देह
हवा से भरी हो - वायुमंडल
और मैं दोनों हाथों से बादलों को उसमें ठूंसता हूँ
जैसे तकिये में रूई को...
जैसे कोई सपना हो यह तीसरा आदमी
याद नहीं आती जिसकी कोई पहचान,

मैं एक बूढ़े आदमी को सुन रहा हूँ
कला दीर्घा की छत पर
सीले हुए अँधरे में
केवल देख रहा हूँ अपने को थोड़ी देर पहले.





29.1.97

© मोहन राणा

Sunday, October 08, 2006

पत्थर हो जाएगी नदी



















अकेले नहीं होंगे तो फिर किस के साथ होंगे

Monday, September 04, 2006

कल फिर कल


मैं सोया सुबह के लिए

जागा इस पल के लिए,

कुछ लिखा जीवन के लिए

ली एक लंबी सांस

छुआ दूर के दृश्य को

एक बादल रुका धूप घड़ी को देख

क्या

दिन था

या

बीच रात

कल फिर कल

देखा पुरखों के सपने को

वे सोए

और मैं जागा उस नींद में




4.9.2006 © मोहन राणा

Wednesday, August 30, 2006

कुछ पाने की चिंता

अपने ही विचारों में उलझता
यहाँ वहाँ
क्या तुम्हें भी ऐसा अनुभव हुआ कभी,
जो अब याद नहीं

बात किसी अच्छे मूड से हुई थी
कि लगा कोई पंक्ति पूरी होगी
पर्ची के पीछे
उस पल सांस ताजी लगी
और दुनिया नयी,
यह सोचा
और साथ हो गई कुछ पाने की चिंता

मैं धकेलता रहा वह और पास आती गई,
अच्छा विचार मुझे अपने आप से भी नहीं बचा सकता,
उसे खोना चाहता हूँ
नहीं जीना चाहता किसी और का अधूरा सपना



30.8.06 © मोहन राणा

Sunday, August 13, 2006

अस्मिता

क्या मैं हूँ वह नहीं

जो याद नहीं अब,

जो है वह किसी और की स्मृति नहीं क्या

जिनसे जानता पहचानता अपने आपको

मनुष्य ही नहीं पेड़- पंछी

हवा आकाश

मौन धरती

घर खिड़की

एक कविता का निश्वास !


पर ये नहीं किसी और की स्म़ृति क्या ?

जो याद है बस

भूलकर कुछ


13.8.06 © मोहन राणा


The Translator : Nothing is Translated in Love and War

  8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...