ठीक करने में लगा हूँ दूरी मापक
काम नहीं करता,
कितनी दूर आ गया
चला गया
पिछली मुलाकात के बाद
याद नहीं यह भी
अब मैं पैदल ही नाप लेता हूँ
अनुपस्थित दूरियाँ
कहीं गए बिना
कहीं से लौटे बिना
बिता देता दोपहर
कल आज कल की
कुरसी पर बैठे खिड़की के नजदीक,
खुली हुई आँखों में भरता एक जगे हुए सपने को.
समेटता दूरियों को
दूर होकर उनसे
दूर ही होता जाता,
असीम विहंगम को बटोरने में लगा
क्या मैं बाँध सकता हूँ उसे एक पुड़िया में?
बात कुछ ऐसी कि
दैनंदिन घने जंगल में गुम धूप के कतरे को खोजता
मैं खुद ही गुम हूँ कहीं
जहाँ ना दूरी मापक काम करते हैं
ना ही दिशासूचक,
क्या मैं पकड़ सकता हूँ
तुम्हारा हाथ कि उठ जाऊँ उसके सहारे इस कुर्सी से
हम जाएँगे पैदल एक साथ कहीं
© मोहन राणा 19.1.2010
Tuesday, January 19, 2010
Wednesday, January 06, 2010
और मैंने एक दिन में हाँ बोल के
....मैंने सिर्फ अपना रोल देखा :-SS
he is great fun he has great sense of humour ~X(
he is great fun he has great sense of humour ~X(
Friday, January 01, 2010
Tuesday, December 29, 2009
अंतिम दिन
भीगती शाम ठिठुरती सर्द पानी में
दरवाजे के बाहर ही है अब नया साल
समय को बाँचता दस्तक देने से पहले
कुछ छुट्टे पैसे ही बचे हैं उसकी जेब में
ये कुछ दिन,
जिनमें ना आशा है ना उदासी
वे ना जिंदा हैं ना अचेत
बस एक बेचैन धड़कन
अगर मैं उन्हें चूम लूँ
तो एक ही डर
कहीं बंध ना हो जाऊँ समय के अविरल प्रवाह में
कहीं भूल ना जाऊँ अपना नाम
कैसे पहचानूँगा फिर तुम्हें!
अभिशप्त जैसे ये क्षण निरंतर आर्तनाद में डूबे
मैं कानों को बंद करता हूँ
पर खुली रह जाती हैं आँखें
----------------
© मोहन राणा
दरवाजे के बाहर ही है अब नया साल
समय को बाँचता दस्तक देने से पहले
कुछ छुट्टे पैसे ही बचे हैं उसकी जेब में
ये कुछ दिन,
जिनमें ना आशा है ना उदासी
वे ना जिंदा हैं ना अचेत
बस एक बेचैन धड़कन
अगर मैं उन्हें चूम लूँ
तो एक ही डर
कहीं बंध ना हो जाऊँ समय के अविरल प्रवाह में
कहीं भूल ना जाऊँ अपना नाम
कैसे पहचानूँगा फिर तुम्हें!
अभिशप्त जैसे ये क्षण निरंतर आर्तनाद में डूबे
मैं कानों को बंद करता हूँ
पर खुली रह जाती हैं आँखें
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© मोहन राणा
Monday, December 14, 2009
गोपन कथा
हमारी जिंदगी ऐसी गोपन कथा सी है हमें सब मालूम
फिर भी खोजते रहते हैं हम संकेतों को उस जिंदगी को जीते हुए
उसे पहेली मान लगे रहते हैं बूझते
पेड़ों से अदृश्य जंगलों में लुढ़कती हुई नींद की ढलानों पर
संभालते अपने आपको
बटोरते अपनी नग्नता को पतझर के बियाबान में
उकेरते अपनी जिंदगी की त्वचा पर संकेत
ये जानकर कि इस गोपन कथा में विस्मृति अपरिहार्य स्थिति है
कि शायद उसके बाद कुछ बची रहे चेतन स्मृति
कि बूझ सकें उन संकेतों को जो हमने लिखे थे भविष्य के लिए,
जिन्हें पढ़ रहें हैं हम आज, उस नन्ही लौ के सहारे समय के अंधकार में
© मोहन राणा
फिर भी खोजते रहते हैं हम संकेतों को उस जिंदगी को जीते हुए
उसे पहेली मान लगे रहते हैं बूझते
पेड़ों से अदृश्य जंगलों में लुढ़कती हुई नींद की ढलानों पर
संभालते अपने आपको
बटोरते अपनी नग्नता को पतझर के बियाबान में
उकेरते अपनी जिंदगी की त्वचा पर संकेत
ये जानकर कि इस गोपन कथा में विस्मृति अपरिहार्य स्थिति है
कि शायद उसके बाद कुछ बची रहे चेतन स्मृति
कि बूझ सकें उन संकेतों को जो हमने लिखे थे भविष्य के लिए,
जिन्हें पढ़ रहें हैं हम आज, उस नन्ही लौ के सहारे समय के अंधकार में
© मोहन राणा
Wednesday, December 09, 2009
Tuesday, December 08, 2009
Monday, November 30, 2009
सवाल नहीं है आज
उठता है सवाल
इस बात पर,
मैं अब आकाश को नहीं ताकता पैरों को घूरता हूँ
मुझे करनी थी प्रतीक्षा उनकी इस पल यहीं
इस एकांत में इस कोलाहल में इस चुप्पी में अपने भीतर इस चीख में
यहीं इस खुशी में इस क्रोध में इस उदासीन समय की करवट में
यह खरोंच ऊँगली पर
धीमे से धड़कती है पीड़ा उसके आसपास,
कहीं चला तो नहीं गया मैं कहीं और आकाश को ताकते
मेरी अपनी छाया गुम है इस एकाएक जवाब पर
मेरा प्रश्न क्या आज सवाल हैं
दिन करता रहा प्रतीक्षा
और प्रश्न जैसे आकर जा भी चुके
तो क्या दिन बीत गया
सुबह हो गई
फिर यह शाम कैसी,
जवाब जिनके लिए नहीं शब्द अब मेरे पास
सवाल नहीं है आज
30.11.09
© मोहन राणा
Saturday, November 07, 2009
सबसे ऊँची छत
सबसे ऊँची छत से क्या बादल दिखाई देते हैं
क्या वहाँ भी होती है बारिश
क्या वहाँ भी बहते हैं पतझर के आँसू गिरती हुई बूँदों में
क्या वहाँ भी होती है दोपहर सुबह और शाम के बीच....
क्या वहाँ दुनिया को बनाने वाला कुम्हार रहता है
मिट्टी की बनी यह दुनिया टूट गई है सबसे ऊँची छत से गिर कर
क्या ठीक कर सकता है वह इसे.
©मोहन राणा
क्या वहाँ भी होती है बारिश
क्या वहाँ भी बहते हैं पतझर के आँसू गिरती हुई बूँदों में
क्या वहाँ भी होती है दोपहर सुबह और शाम के बीच....
क्या वहाँ दुनिया को बनाने वाला कुम्हार रहता है
मिट्टी की बनी यह दुनिया टूट गई है सबसे ऊँची छत से गिर कर
क्या ठीक कर सकता है वह इसे.
©मोहन राणा
Friday, November 06, 2009
जहाँ बादल सुनाते हैं संदेश
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