Monday, February 01, 2010

चाँदनी रात में खामोशी

मैं सहमत हूँ
चाँदनी रात में खामोशी से
मन में सीत्कारती चिंताओँ से
दिल में कुछ ढोती बेचैनी से
कमर में किसी बोझ की अनुभूति से
मुझ से थक चुकी नींद से
मैं सहमत हूँ
तुम्हारे भय से
दिन के अँधेरे में चलते आर्तनाद से,
असहमतियों के साथ बैठे
इस स्थिति से सहमत हूँ
थक चुका हूँ कतारें बदलते बदलते

निश्चित नहीं है जीवन में आश्चर्य हमेशा
अगर किसी को मालूम हो घड़ी में निरंकुश समय बदलना
हो चुका है अतीत जो अब याद नहीं है भविष्य की तरह,
कितनी बार बदली सूईयाँ मैंने इसकी
हर बार मैँ ही गिरता
मैं ही चूकता
मैं ही भूलता
साबुन के बुलबुले उड़ाते

© मोहन राणा
31.1.10

Tuesday, January 26, 2010

खोए बच्चों के नाम

एक चिठ्ठी मैं लिखना चाहता हूँ खोए बच्चों के नाम
शहतूत की टहनियों से टँगे
छोटे होते जाते हैं उनके कपड़े
फैलती हैं टहनियाँ
घना होता जाता है शहतूत
और सालों में कभी एक बार मैं बूढ़े पेड़ को देखता हूँ
अपनी छाया पर झुके हुए,
तार-तार होते जाते हैं कपड़े
उनकी स्मृतियाँ हवा में मिलती हैं पानी
में घुलती हैं मौसमों में डूबती हैं
महीन होती जाती भूली हुई कविता सी,

मैं लिखना चाहता हूँ अपने बारे में पर
किसी और की कहने लगता हूँ
समकालीन पुराने हो जाते हैं,
एक दिन वे खो जाएँगे
खोए हुए बच्चों की तरह एक दिन
एक दिन खो जाएगा – कई दिनों में कहीं,

एक चिठ्ठी मैं लिखना चाहता हूँ
खोए हुए बच्चों के नाम
खोए हुए बचपन की ओर से

18.8.1995

(सुबह की डाक / कविता संग्रह से)

Monday, January 25, 2010

सैमसंग द्वारा प्रायोजित

यह कविता ना समझ सकती
ना लिख सकती
ना पढ़ सकती
भाषा सीख के भी
ना जान सकती

फिर

इस बंदर बाँट में
नई बिल्ली से डर किसको है
राष्ट्रीय हो अंर्तराष्ट्रीय हो बहुराष्ट्रीय हो
बहुलोकी हो
यह बहुरूपिया !

डर किसको है इस बिल्ली से
कौने बाँधे घंटी इसको,
अगल बगल
हम निकल भागते , साथ साथ
यह हिम्मत कैसी
छुपा कर मुँह रजाई में,

पहले हम उतारें घंटियाँ अपनी
बाँधे तब तो ना कोई अजातशत्रु इस बिल्ली को,
लंबी हैं ये घनघोर सर्दियाँ कोहरे की
हो गए हम अभिशप्त जीते जी


© मोहन राणा

Tuesday, January 19, 2010

बात कुछ ऐसी कि

ठीक करने में लगा हूँ दूरी मापक
काम नहीं करता,
कितनी दूर आ गया
चला गया
पिछली मुलाकात के बाद
याद नहीं यह भी

अब मैं पैदल ही नाप लेता हूँ
अनुपस्थित दूरियाँ
कहीं गए बिना
कहीं से लौटे बिना
बिता देता दोपहर
कल आज कल की
कुरसी पर बैठे खिड़की के नजदीक,
खुली हुई आँखों में भरता एक जगे हुए सपने को.

समेटता दूरियों को
दूर होकर उनसे
दूर ही होता जाता,
असीम विहंगम को बटोरने में लगा
क्या मैं बाँध सकता हूँ उसे एक पुड़िया में?
बात कुछ ऐसी कि
दैनंदिन घने जंगल में गुम धूप के कतरे को खोजता
मैं खुद ही गुम हूँ कहीं
जहाँ ना दूरी मापक काम करते हैं
ना ही दिशासूचक,

क्या मैं पकड़ सकता हूँ
तुम्हारा हाथ कि उठ जाऊँ उसके सहारे इस कुर्सी से
हम जाएँगे पैदल एक साथ कहीं


© मोहन राणा 19.1.2010

Wednesday, January 06, 2010

बरफ गिरती रही रातभर


कुछ देर मैं खुश होता हूँ आँखें मूँदे बर्फीले सन्नाटे में
सुनता जैसे कुछ भी नहीं सुनकर

और मैंने एक दिन में हाँ बोल के

....मैंने सिर्फ अपना रोल देखा :-SS




he is great fun he has great sense of humour ~X(

Friday, January 01, 2010

नववर्ष 2010





नववर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनाएँ

Tuesday, December 29, 2009

अंतिम दिन

भीगती शाम ठिठुरती सर्द पानी में
दरवाजे के बाहर ही है अब नया साल
समय को बाँचता दस्तक देने से पहले
कुछ छुट्टे पैसे ही बचे हैं उसकी जेब में
ये कुछ दिन,
जिनमें ना आशा है ना उदासी
वे ना जिंदा हैं ना अचेत
बस एक बेचैन धड़कन

अगर मैं उन्हें चूम लूँ
तो एक ही डर
कहीं बंध ना हो जाऊँ समय के अविरल प्रवाह में
कहीं भूल ना जाऊँ अपना नाम
कैसे पहचानूँगा फिर तुम्हें!

अभिशप्त जैसे ये क्षण निरंतर आर्तनाद में डूबे
मैं कानों को बंद करता हूँ
पर खुली रह जाती हैं आँखें


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© मोहन राणा

Monday, December 14, 2009

गोपन कथा

हमारी जिंदगी ऐसी गोपन कथा सी है हमें सब मालूम
फिर भी खोजते रहते हैं हम संकेतों को उस जिंदगी को जीते हुए
उसे पहेली मान लगे रहते हैं बूझते
पेड़ों से अदृश्य जंगलों में लुढ़कती हुई नींद की ढलानों पर
संभालते अपने आपको
बटोरते अपनी नग्नता को पतझर के बियाबान में
उकेरते अपनी जिंदगी की त्वचा पर संकेत
ये जानकर कि इस गोपन कथा में विस्मृति अपरिहार्य स्थिति है
कि शायद उसके बाद कुछ बची रहे चेतन स्मृति
कि बूझ सकें उन संकेतों को जो हमने लिखे थे भविष्य के लिए,
जिन्हें पढ़ रहें हैं हम आज, उस नन्ही लौ के सहारे समय के अंधकार में

© मोहन राणा

The Translator : Nothing is Translated in Love and War

  8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...