Saturday, August 28, 2010

दो पहरों के बीच

काली चिड़िया के मुँह में लाल बेरी
सीत्कारता है मंडराता बाज़
पल को सांस रोक लेती है पेड़ों की डालें..

Friday, August 27, 2010

पुराने दिल्ली के स्टेशन बाहर



{The Taoist sage has no ambitions, therefore he can never fail. He who never fails always succeeds. And he who always succeeds is all- powerful}
चंपारण से कई घंटो की सत्याग्रह एक्सप्रेस यात्रा के बाद
जनसेवक जी बड़ी मुश्किल से कमर सीधी कर प्लेटफार्म पार कर सके
बाहर बाबा लाउत्से अपने तोते के साथ बैठे थे
टैस़ला से जानें अपना भविष्य, मुड़े हुए गत्ते पर बाकी मिट गया था,
प्यार से पुचकारते टैस़ला को दाना चुगाते
एक दाना वे खुद भी चबा लेते,
जनसेवक जी अपना झोला झाबा संभालने वहाँ रुके
कि लाउत्से ने आवाज दी
अरे ओ जनसेवक कहाँ जाता है बच्चा
ले जाने ले अपना भविष्य टैस़ला से
काली के युग में हाहाकार
बतायेगा तुम्हारी महादशा
जान ले इससे पहले हो जाए तुम्हारी लालबत्ती,
जनसेवक जी पान की पीकों से रंगीन पौधे के गमले की ओर छड़ी उठा के बोले
नहीं भय्या जल्दी ही
अपनी तो बत्ती जाने कब से फ्यूज़् ही है

©27/8/10

Thursday, August 26, 2010

पूर्वपीठिका

मैंने सुने खोये हुए पदचाप उस किनारे में दबे
बनाते हुए पुल, अविराम सांसों के साथ जुटा हूँ पूरा करने में.
आने को है एक मौसम, बह जाएगा उसके सैलाब में रेत का पुल कभी
उससे पहले पार कर लूँ समय की नदी को बिना नाव के,
सोते हुए क्या मुझे याद रहेगा यह सपना
सुबह की नींद में जाग कर भी

©26/8/10 मोहन राणा

Wednesday, August 18, 2010

दोपहर के बीच गुमनाम दिन

दोपहर के बीच गुमनाम दिन
मैं दोस्तों को पहचान कर अपनी पुष्टि करता हूँ..
भविष्य है पहले से ही हुआ, हमें सिर्फ यह अब याद नहीं है.


















© मोहन राणा

कविता के लिए कोई नया शब्द नहीं

मेरी पड़ोसन ने संगीत का स्वर अपने मकान में तेज कर दिया, पिछली कई मर्तबा से भी तेज
मकान की दीवारें अचानक जैसे अपनी गहरी तंद्रा से जाग उठी यह कैसा ध्वनि तंत्र इस पड़ोसन ने आज चालू कर दिया,
मैं संग्रह के ड्राफ्ट में उलझा बैठा हूँ वह शराब पी के ऊँची आवाज में संगीत सुन रही है- कैसे कोई सुन सकता है मदहोशी में... मेरी खीज धीरे धीरे बढ़ती गई.. आखिर मुझसे रहा नहीं गया.
बाहर सड़क पर पार्क कारों और अकेली खंबो की जगमगाहट के कोई नहीं दिखता, रविवार की शाम है.
मैंने थोड़ा साहस करके दरवाजे की घंटी बजाई.. पर भीतर से संगीत के अलावा कुछ सुनाई नहीं दिया..
आखिर में लड़खड़ाती सी वह दरवाजे पर आई , मैंने उसे कहा.. जरा.. कृपया संगीत कम कर दें.... अह ओके, मदहोश स्वर में उसने कहा और दरवाजा बंद कर दिया..
मैं उम्मीद के साथ फिर डेस्क पर..
पर अब संगीत जैसे कुछ और उद्वेलित हो गया.... आखिर फिर कुछ देर तक अपने ही आत्मविवाद से गुस्सा कर मैं फिर उसके दरवाजे की ओर बढ़ गया..
इस बार एक खुरदरी सफेद दाढ़ी वाला आदमी दरवाजे पर उपस्थित हुआ
.. ये संगीत जरा कम कीजिये ना
.. नहीं मैंने कम कर दिया है वह खीज के बोला..
मेरे घर से आप आ कर सुनें कितना तेज है दीवारें कांप रही हैं, मैंने उसे आमंत्रित किया
नहीं,उसका स्वर कुछ उत्तेजित हो गया, मैंने कम करना था कर दिया.
संगीत कम करिये जरा मैं कुछ लिख रहा हूँ,
क्या समय हुआ वह बोला ये कोई लिखने समय है क्या..
मैं लेखन ही करता हूँ और 11.45 हुए हैं.. प्रतिवाद करते मैं बोला
ये लिखने का समय नहीं है सुबह लिखना अचानक वह सलाह के मूड में आ गया
अब सो जाओ..
...ये संगीत कम .. मेरा वाक्य अधूरा ही रह गया
नहीं..कहते उसने दरवाजा बंद कर दिया. संगीत डेढ़ बजे रात तक चलता रहा. मैंने कंप्यूटर बंद कर दिया... कुछ सोचने की कोशिश, सोने की भी..
कविता के लिए कोई नया शब्द नहीं मिला. मैंने उसे अँधेरे में कहीं रख दिया और आशा कि दिन के उजाले में उसे खोजूँगा.
आशा एक बोझ है जरूरी बोझ, और हमेशा उसके अनुपस्थित हो जाने का भय कहीं, समानंतर उपस्थित.
सपने में मैंने देखा
एक औरत अटकलें लगा रही है बीस बिलयन पाउंड में ग्यारह शून्य होते हैं..ग्यारह शून्य.. शून्य
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Thursday, June 17, 2010

रस्साकशी

सच में कहानी कैसी
जब सच केवल एक याद हो
लगातार भूलती हुई,
और जीता हो कोई उसे अपना समझ कर
किसी आयाम में
एक दिन यह रस्सी का सिरा छूट जाएगा मेरे हाथों से.

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Sunday, May 23, 2010

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रद्दी में गई लिफाफों में बदल गई कविताओं का
विशेष संग्रह यहाँ उपलब्ध है








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Saturday, May 01, 2010

मेरे पाँवों पर उगी है दूब

तुम दूर से मुझे देखो
तो दिखता हूँ पत्थर का बुत
नजदीक आ कर देखो
तो दिखता हूँ कंकड़ों का समझौता,

मेरे पाँवों पर उगी है दूब
ताजी बस अभी ही उगी.
हवा सीटियाँ बजाती
चुभोती है अपने नाखून मेरी देह में
और खुरचती है बारिश मेरी त्वचा,
मेरी नग्नता के भीतर से गुजरते हैं
कई आकाश और छायाएँ
लंबी घड़ियों से मुक्त कोई दोपहर
दिन को हटाती कोई शाम,
मेरे भीतर एक अधपकी रोटी है
तपा रही है धूप उसे
जाने कब से

हर दिन मैं याद करता हूँ अपने बारे में
भूल जाता हूँ
इच्छाओँ के नीचे ढकी हैं मेरी आँखें
जैसे बेलों के नीचे कोई दीवार उस दीवार पर हो सकते हैं
कई नाम
किसी जगह के दिशा संकेत,
कुछ मिटते निशान
कोई चिन्हा हुआ दरवाजा
मैं इन संभावनाओं पुष्टि नहीं कर सकता फिलहाल,

नहीं बोला वर्षों से
मैंने कोई शब्द
तुम नहीं सुन पाओगे मेरी आवाज
मैं भी नहीं सुन पाता
जाने किस शरद में पत्तों के साथ मेरे कान भी गिर गए

मेरे नजदीक आओ
लगाओ अपने कान मेरी छाती पर
शायद सुन पाओ धड़कन अपनी


14.12.1993 ©

Monday, March 29, 2010

एक समय

कुछ दिनों में आएगा एक मौसम
इस अक्षांस में
कुछ दिनों में आएगा एक समय,
जिसे याद रखने के लिए भूलना पड़ेगा सबकुछ
क्षणभंगुर भविष्य को जीते
मैंने अतीत को नहीं देखा है अब तक



©
29.3.2009

The Translator : Nothing is Translated in Love and War

  8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...