


हम जो सोचते हैं वास्तविकता कुछ और होती है.
अनुभव ही सब कुछ है, प्रश्न भी वही उत्तर भी,
देव वही दानव वही ,चेतना और पदार्थ भी, अर्थ और अर्थहीन दोनों वही, बस अनुभव
नींद और जागने का. दरवाजे पर डाकिया घंटी बजाता है सुबह सुबह,
मुस्कराता है - मुझे नींद में चलता देख - कहता है, 'मुझे मालूम था तुम भीतर ही थे'.
©22.4.06




फोन आया ...मैं कुछ सोच ही रहा था,आश्चर्य को आश्चर्य ही होना चाहिए ना.
मैंने कभी किसी अन्य जीव को यह कहते नहीं सुना काश मैं मनुष्य होता...
लेकिन जब मैं किसी चिड़िया को हवा में कलाबाजी करते देखता हूँ तो सोचता हूँ काश में उस उड़ान को भर
पाता.

8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...