Sunday, September 04, 2011

Tuesday, August 23, 2011

आत्मक्लेष

है एक उड़ान इस आहवान में,
सबके साथ नहीं होता यह
जो खुली रह जाएं आखें झुकी पलकों में,
इस तेज आंधी में नहीं दिखता
शब्दों की ढलानों पर
असभ्य हुक्मशाहों के विरूद्द कोई बोलता
न किसी के जलसे में ना किसी परचम नीचे
ना पंडाल में ना किसी सेमिनार ना किसी फोरम पोस्ट में,
मोहल्ले में चुप्पी कविता के जनपद में कवियों की अनुपस्थिति
कुछ दिन ही हुए हैं बार बार लौटते इस ख्याल में
पर ऐसे ही बीत गए हैं चौंसठ बरस जुड़ते जुड़ते
कोई फुसफुसाता है धीमे से, सच भी दगाबाज निकल आता है कभी.
सपने खुद ही लेते हैं सांस
इस बरगद की छांव में

©

Saturday, August 06, 2011

खरगोश

इस अँधेरे में हम सुनते अपनी साँस
पर थोड़ी देर में वह भी बंद हो जाती सुनाई देना,
सुनते हैं अपनी धमनियों में रिसती पीड़ाएँ
पर थोड़ी देर में वे भी रुक जातीं रिसना
और अँधेरा मिट्टी और हम एक हो जाते

2002

© मोहन राणा

Tuesday, July 26, 2011

गर

अकेला नहीं कोई
टापू भी नहीं
धरती भी नहीं ठंडे अंधकार में
थोड़ी देर गर भूल जाऊँ
अपने को ही याद करना

Friday, June 24, 2011

परसों का नाश्ता आज

समय पर सब कुछ होने की सलाह दी जाती
जल्दी क्या !
और मैं खुद ही देता हूँ
अपनी मोचों पर किसमत का मरहम लगाते हुए
पर तारीखें जैसे पहले से तय
बस याद नहीं कि क्या हो चुका
असावधान वर्तमान में हमेशा अतीत ही उपस्थित,
हाथ बाँधे सिर झुकाए. पर मैं कभी नहीं पहचान पाता.

हरे पेड़ भी भयभीत हैं उस बादल की छाया में
जो प्रकट होता है बेआवाज़,
मुझे बताने से क्या फायदा
आप खुद सुनना नहीं चाहते अपनी जुबानी
कि हजारों फीट से मिसाइल कहीं और ही गिराई जाती है,
सुबह आराम से चाय के साथ पढ़ते हुए
आज खा रहा हूँ परसों का नाश्ता


©

Sunday, June 19, 2011

कविता पाठ / Poetry Reading

कविता पाठ / Poetry Reading

Mohan Rana and Bernard O'Donoghue


Mohan Rana and Bernard O'Donoghue

Start/End Date(s)
25 June 2011
25 June 2011
2pm - 3.30pm


Venue

SCOTTISH POETRY LIBRARY

5 Crichton's Close, Canongate, Edinburgh, EH8 8DT

Information

Part of the Mohan Rana and Bernard O'Donoghue Chapbook Tour, in association with the Poetry Translation Centre

Mohan Rana and Bernard O'Donoghue read together to celebrate the publication of Poems by Mohan Rana, translated by Bernard O'Donoghue and Lucy Rosenstein.

More about the Poetry Translation Centre: http://www.poetrytranslation.org/

Please email reception@spl.org.uk to reserve your place

Tuesday, June 07, 2011

नई किताब

तेरह कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद की द्विभाषी कविता पुस्तिका. कविताओं के हिन्दी से अंग्रेजी में अनुवाद लूसी रोज़नश्टाइन और आयरिश मूल के कवि बनार्ड ओ डैनह्यू ने किये हैं. इसे Poetry Translation Centre London ने ८ जून २०११ को प्रकाशित किया है . संग्रह में शामिल कविताओं का पहली बार सार्वजनिक द्विभाषी पाठ लंदन की The Whitechapel Gallery में आयोजित 'Where Three Dreams Cross: 150 Years of Photography from India, Pakistan and Bangladesh' प्रदर्शनी में ४ फरवरी २०१० को किया गया था. ये कविताएँ ब्रिटिश लाइब्रेरी के श्रव्य संग्रह में भी संग्रहित हैं.




Tuesday, May 24, 2011

मछली की सांस

क्या अतीत से ही हम पहचनाते हैं भविष्य के वर्तमान को,

आइने भी नहीं कर पाते पुष्टि हमारी शंकाओँ की
हर सुबह किसी रात का सपना ही होती है

गहराई सतहों के उद्वेलन में नहीं होती
पर हमारे पास नहीं मछली की सांस कि वहाँ उतर सकें

Monday, May 09, 2011

भविष्य













कुछ
दिनों में आएगा एक मौसम

इस अक्षांस में

कुछ दिनों में आएगा एक समय,

जिसे याद रखने के लिए भूलना पड़ेगा सबकुछ

क्षणभंगुर भविष्य को जीते,

मैंने अतीत को नहीं देखा है अब तक

29.3.2009

©मोहन राणा

Thursday, May 05, 2011

रेत के पुल पर गिरगिट

सच है क्या - ना दिखे तो भ्रम
दिखे तो संशय होता है खुद पर

नदी पत्थर हो चुकी
रेत के पुल पर गिरगिट
किसी परछाईं के जीवाश्म को देख चौंकता

© मोहन राणा

Friday, April 29, 2011

गिरगिट


कितने नाम बदले चलन के अनुसार रंगत भी

बोलचाल के लिए बदले रूपक बदलने के लिए तेवर

एक दो गालियाँ भी पर हर करवट बेचारगी के शब्दों से भरपूर,

यह ट्रिक हमेशा काम करती है बंधु

बिल्ली के गले में कागज की घंटी बाँध सोया हुआ हूँ सपनों में सलाहें देता,

आश्वासन के खाली लिफाफों को बाँटता

आशा का तराजू बट्टा किसी के बस्ते में डालता

बदलाव की पुकार लगाता दिशाओं को गुमराह करता

लुढ़कता वसंत की ढलानों पर मैं गिरता हुआ पतझर हूँ,

क्या मुझे याद रह पाएगा हर रंगत में हर संगत में

यह उधार का समय जो मेरी सांसो से जीता रहता है मेरा ही जीवन

रटते हुए अक्सर भूल जाता हूँ सच बोलना.

7.11.2008


© मोहन राणा

The Translator : Nothing is Translated in Love and War

  8 Apr 2025 Arup K. Chatterjee Nothing is Translated in Love and War Translation of Mohan Rana’s poem, Prem Au...